Friday, June 20, 2014

हिंदी

मेरे परम प्रिय एवं अभिन्न मित्र ने आज कुछ ऐसा पोस्ट कर दिया फेस बुक पर कि उस पर टिप्पणी करना मैं अत्यावश्यक समझता हूँ

आप सब को पूरा मामला समझ आ जाए इस लिए पहले मैं मित्र सुधीर बट्टा जी द्वारा पोस्ट की गई सामग्री आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ और फिर उस के बाद अपनी टिपण्णी, इस विनम्र आग्रह के साथ कि फेस बुक का बुद्धि जीवी वर्ग इस बारे में अपनी राय अधिक से अधिक संख्या में अवश्य दे कर आगे के लिए मर्ग प्रशस्त करेगा 
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श्री सुधीर बट्टा जी लिखते हैं
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"I too proud speaker of Hindi"........
Many are not aware that we spent Rs. 50 million in 1977 to enable Mr. Vajpayee,the then Foreign Minister ,to speak in Hindi,for a few minutes,at the UN....The country pays for an unnecessary show nationalism and ego.....At home this is "OK'....We cant progress globally by speaking in a language that has the same word "Yesterday" and "Tomorrow".
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मेरी विनयपूर्वक टिप्पणी
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मित्र
मैं आपकी बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ
  सबसे पहले तो आपने एक उदाहरण दिया "कल" का  yesterday and tomorrow
के संदर्भ में
इस प्रकार के नाम मात्र गिनती के उदाहरण हो सकते हैं हिंदी के लिए
परन्तु
 "UNCLE"  और "AUNTI"  के बारे में आप क्या कहेंगे की चाचा, ताया, फूफा, मौसा, मामा, मामी,बुआ,मौसी,ताई इत्यादि के लिए क्या "आंगल" भाषा में कोई उपयुक्त शब्द हैं ?

अरे मेरे भाई हिंदी जो की संस्कृत से जन्मी है उसका शब्दकोश तो इतना विस्तृत है की गणना करना भी शायद मुश्किल होगा जब से विश्व में संस्कृत भाषा का प्रदुर्भाव हुआ है करोड़ों ये अरबों नहीं अब तक हज़ारो खरब शब्द देवनागरी(संस्कृत) के प्रयोग हो चुके हैं जब कि आंगल भाषा में ये आंकड़ा मात्र कुछ करोड़ पर अटका हुआ है

अब तो शायद आपको विदित होगा कि वैज्ञानिकों ने भी हिंदी को सबसे समृद्ध भाषा मान लिया है और यह सर्वविदित ( मैं साक्षर और शिक्षित समुदाय की बात कर रहा हूँ) है कि कम्प्यूटर ने मात्र संस्कृत (देवनागरी) को ही विश्व की किसी भी भाषा के अनुवाद के लिए सक्षम माना है

और एक तथ्य आप को और बता दूँ विश्व की लगभग सभी भाषाएँ संस्कृत से ही उतपन्न हुई हैं और आपकी आंगल भाषा भी इस तथ्य से अछूती नहीं और आप को यह तो ज्ञात ही होगा कि संस्कृत एक भाषा है जिसके लिपि देवनागरी है और हिंदी कि लिपि भी देवनागरी ही है

अत: मात्र एक आध उदाहरण दे कर हिंदी जो कि हमारी मातृ भाषा भी है उसका अपमान मत करिये ये मेरा विनम्र आग्रह है

अब आईये विदेशों में अत्यधिक खर्च कर के हिंदी में अपनी बात कहने पर
आज हमारा देश किस-किस मुद्दे पर खर्च नहीं कर रहा

विशिष्ट लोगों की अकारण विदेश यात्रा
सुरक्षा
पर्यावरण
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खेलें
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वैज्ञानिक खोजें 
(जबकि आज केवल Research  अर्थात  Re-search  हो रही है , Search  अर्थात खोज तो हमारे ऋषी मुनी हज़ारों लाखों साल पहले कर चुके हैं जो सब वेदों में वर्णित है)
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चिकित्सा
(इस पर भी हमारे चरक, वाग्भट्ट, और अन्य अनगिनित आयुर्वेदाचार्यों और ऋषियों ने बहुत कुछ शोध कर के वेदों में लिख रखा है और आश्चर्य की बात है कि आज की चिकित्सा  प्रणाली चाहे वो शल्य चिकित्सा हो अथवा औषध विज्ञान अथवा किसी भी और क्षेत्र का संज्ञान, उस लाखों वर्ष पूर्व लिखे किसी भी सूत्र को ना तो काट पाया, ना  गलत सिद्ध कर पाया, और ना ही कुछ नया खोज पाया)
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ऐसे ही और भी ना जाने कितने क्षेत्र हैं जिन पर हमारी सरकार अनाप शनाप खर्च कर रही है और बरसों से करती रही है यही कारण है की हम दिन पर दिन पिछड़ रहे हैं


अत: अंत में निवेदन है कि हिंदी के प्रयोग से देश का कुछ भी अनिष्ट नहीं होने वाला हां इस से विश्व में हमारी प्रतिष्ठा अवश्य बढ़ रही है और बढ़ेगी अत: इस बात का विरोध छोड़ कर किसी सार्थक मुद्दे (विषय)पर चर्चा करें तो अधिक समीचीन होगा

Sunday, June 15, 2014

एक बार एक जर्मन , एक
पाकिस्तानी और एक
सरदार जी अरब देश में
शराब पीते हुए पकड़े गए ,
इसके लिए वहां के शेख ने
उन्हें 20-20 कोड़े मारने
की सजा सुनाई , सजा से
पहले शेख ने कहा की " आज
मेरी बेगम की सालगिरह है
और वो चाहती है
की अपनी सजा से पहले तुम
लोग एक एक मन्नत मांग
लो "....... जर्मन ने
कहा की मेरी पीठ पर एक
तकिया बाँध
दिया जाये......लेकिन ­
तकिया ज्यादा देर तक
नही टिका और उसे 10 कोड़े
अपनी पीठ पर
ही खाने ...पड़े....
पाकिस्तानी ये देखकर डर
गया और
बोला की मेरी पीठ पर 2
तकिये बाँधे जाएँ......लेकिन
वो भी ज्यादा देर नही चले
और उसे 8 कोड़े अपनी पीठ
पर खाने पड़े .......
जब सरदार
जी की बारी आई तो शेख ने
कहा की तुम दुनिया के बेहद
खूबसूरत देश से आये
हो जो अपनी अहिंसा के
लिए जाना जाता है , तुम
एक नही दो मन्नत मांग
सकते हो......सरदार जी ने
सर झुकाकर बहुत नरमी से
कहा में आपका एहतराम
करता हूँ और इस नवाजिश के
बदले 20 नही , 100
कोड़ों की मांग
करता हूँ.......शेख ने
आश्चर्यचकित होते हुए
पूछा की तुम्हारी दूसरी ख्वाहिश
क्या है ?
सरदार जी ने फिर से सर
झुकाकर मुस्कराते हुए
कहा ......
मेरी दूसरी ख्वाहिश ये है
की ...........मेरी पीठ पर
पाकिस्तानी को बाँध
दिया जाये!!
टीचर : सारे जोक सरदारों पर क्यूँ बनते हैं ?

एक सिख स्टूडेंट : एक तो जब देश में मुगलों का शासन था तो उनसे अपनी बहु बेटियों और धर्म बचाने की ज़रूरत थी। तो सिखों ने अपनी और अपने परिवारों की कुर्बानियां देकर बचाया।

फिर अंग्रेजों से देश की आज़ादी के लिए सिखों ने कुर्बानियां दी।

आज़ादी मिल गई अब समस्या भूख की आई देश में तो सिखों ने 90% अनाज पैदा करके भूख की समस्या ख़त्म की।

भूख मिटी तो देश हँसना चाहता था तो ९०% जोक्स भी सरदारों पर व्यंग बने.......

सारे जोकेस खंग्रेस्स ने बनाए

यानि
सरदार है तो इज्ज़त हैं,
सरदार है तो सुरक्षा हैं,
सरदार है तो खाना हैं,
सरदार है तो घरों मंदिरों में पूजा हैं,
सरदार है तो देश की सीमाएं सुरक्षित हैं,
ये सरदार हैं तो ज़िन्दगी आसान हैं,

और

ये सरदार देश की शान हैं।

मैं तकरीबन २० साल के बाद विदेश से अपने शहर लौटा था ! बाज़ार में घुमते हुए सहसा मेरी नज़रें
सब्जी का ठेला लगाये एक बूढे पर जा टिकीं,बहुत कोशिश के बावजूद भी मैं उसको पहचान
नहीं पा रहा था ! लेकिन न जाने ऐसा क्यों लग रहा था की मैं उसे बड़ी अच्छी तरह से जानता हूँ !
मेरी उत्सुकता उस बूढ़े से भी छुपी न रही , उसके चेहरे पर आई अचानक मुस्कान से मैं समझ
गया था कि उसने मुझे पहचान लिया था !
काफी देर की कशमकश के बाद जब मैंने उसे पहचाना तो मेरे पाँव के नीचे से मानो ज़मीन
खिसक गई ! जब मैं विदेश गया था तो इसकी बहुत बड़ी आटा मिल हुआ करती थी नौकर चाकर
आगे पीछे घूमा करते थे !धर्म कर्म, दान पुण्य में सब से अग्रणी इस दानवीर पुरुष को मैं
ताऊजी कह कर बुलाया करता था !
वही आटा मिल का मालिक और आज सब्जी का ठेला लगाने पर मजबूर?
मुझ से रहा नहीं गया और मैं उसके पास जा पहुँचा और बहुत मुश्किल से रुंधे गले से पूछा :
"ताऊ जी, ये सब कैसे हो गया ?"

भरी ऑंखें लिए मेरे कंधे पर हाथ रख उसने उत्तर दिया….

"बच्चे बड़े हो गए हैं बेटा !"

मानसिक रोगी---पागलखाने मेँ लोहे के ऊँचे खंभे पे एक पागल चढ़ गया। 
लोगो ने उसे उतरने के लिये कहा। 
पर वो नहीं उतरा।
किसी ने कहा कि उतर नहीं तो गोली मार दूँगा।
फिर भी नहीं उतरा। 

सब लोग सारे प्रयास करके हार गये 

तभी दिग्गीराजा आये। 
उन्होने पागल से कहा 
कि अगर नहीँ उतरोगे 
तो इस छोटी कैंची से 
इस खंबे को काट दूंगा। 

इतना सुनते ही 
पागल तुरंत उतर आया। 

सबने दिग्गी की खूब तारीफ की। 

फिर सबने पागल से पूछा 
कि हमलोग कितना भी डरा-धमका लिये,
गोली मारने की धमकी दे दिये।
पर तुम नहीं उतरे।


लेकिन दिग्गीराजा ने 

छोटी कैंची से 
इतने मोटे खंबे को काटने को कहा 
और
तुम उतर गये।
ऐसा क्यों?? 


तब पागल ने कहा-

आपलोग दीमागी तौर पे स्वस्थ हो।
भरोसा था की आप कुछ नहीँ करोगे। 

लेकिन ये तो दीमागी तौर पे मेरे जैसा है,
ये तो कुछ भी कर देता।
..
..

पत्थर तब तक सलामत है जब तक वो पर्वत से जुड़ा है.
पत्ता तब तक सलामत है जब तक वो पेड़ से जुड़ा है.
इंसान तब तक सलामत है जब तक वो परिवार से जुड़ा है
क्योंकि परिवार से अलग होकर आज़ादी तो मिल जाती है लेकिन संस्कार चले जाते हैं...

..
क्या गुज़री होगी उस बुढ़ी माँ के दिल पर जब उसकी बहु ने कहा -: "माँ जी, आप अपना खाना बना लेना, मुझे और इन्हें आज एक पार्टी में जाना है.!!"

बुढ़ी माँ ने कहा -: "बेटी मुझे गैस चुल्हा चलाना नहीं आता.!"

तो बेटे ने कहा -: "माँ, पास वाले मंदिर में आज भंडारा है, तुम वहाँ चली जाओ खाना बनाने की कोई नौबत ही नहीं आयेगी.!"

माँ चुपचाप अपनी चप्पल पहन कर मंदिर की ओर हो चली गयी

यह पुरा वाक्या 10 साल का बेटा रोहन सुन रहा था |

पार्टी में जाते वक्त रास्ते में रोहन ने अपने पापा से कहा -: "पापा, मैं जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा ना तब मैं भी अपना घर किसी मंदिर के पास ही बनाऊंगा.!"

माँ ने उत्सुकतावश पुछा -: "क्यों बेटा?"
.
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रोहन ने जो जवाब दिया उसे सुनकर उस बेटे और बहु का सिर शर्म से नीचे झूक गया.

रोहन ने कहा -: "क्योंकि माँ, जब मुझे भी किसी दिन ऐसी ही किसी पार्टी में जाना होगा तब तुम भी तो किसी मंदिर में भंडारे में खाना खाने जाओगी ना और मैं नहीं चाहता कि तुम्हें कहीं दूर मंदिर में जाना पड़े.!"