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Sunday, April 10, 2016

सत्य

सत्य को शब्द देना संभव नहीं

एक दिन मैं मंदिर गया था।
पूजा हो रही थी।

मूर्तियों के सामने सिर झुकाए जा रहे थे।

मनुष्य भी अजीब है।
अपने ही हाथों बनाई मूर्तियों को
भगवान समझ
स्वयं को धोखा दे लेता है!

मनुष्य के हाथों और मनुष्य के मन से
जो भी रचित है, वह धर्म नहीं है।
मंदिरों में बैठी मूर्तियां भगवान की नहीं,
मनुष्य की ही हैं।

शास्त्रों में लिखा
हुआ मनुष्य की अभिलाषाओं और विचारणाओं
का ही प्रतिफलन है-

सत्य का अंतर्दर्शन नहीं।
सत्य को तो शब्द देना संभव नहीं है।

सत्य की कोई मूर्ति संभव नहीं हैं;
क्योंकि वह असीम है,
अनन्त और अमूर्त है।
न उसका कोई रूप है,
न धारणा, न नाम।
आकार देते ही वह
अनुपस्थित हो जाता है।

उसे पाने के लिए
सब मूर्तियां और सब मूर्त धारणाएं
छोड़ देनी पड़ती हैं।
स्व-निर्मित कल्पनाओं के
सारे जाल तोड़ देने पड़ते हैं।

वह असृष्ट तब प्रकट होता है,
जब मनुष्य की चेतना
उसकी मन:सृष्ट कारा से
मुक्त हो जाती है।

वस्तुत: उसे पाने को
मंदिर बनाने नहीं,
विसर्जित करने होते हैं।

मूर्तियां गढ़नी नहीं,
विलीन करनी होती हैं।
आकार के आग्रह खोने पड़ते हैं,
ताकि निराकार का आगमन हो सके।

चित्त से मूर्त के
हटते ही वह अमूर्त प्रकट हो जाता है।
वह तो था ही,
केवल मूर्तियों और मूर्त में दब गया था।

जैसे किसी कक्ष में
सामान भर देने से रिक्त स्थान
दब जाता है।
सामान
हटाओ और वह जहाँ था, वहीं है।

ऐसा ही है,सत्य।
मन को खाली करो वह है।